
न जाने क्यूँ
आगे नहीं बढ़ पाई मैं
मेरे छोटे से मौहल्ले के
वो जाने पहचाने चेहरे
दुःख-सुख की लकीरें
पार्क में सखियों संग कबड्डी
बैडमिंटन की याद से
आगे नहीं बढ़ पाई मैं
न जाने क्यूँ
आगे नहीं बढ़ पाई मैं
त्यौहारों पर बजते गीत
होली दहन में भुने
गेंहूँ की बाली के स्वाद
मंदिर की घंटियों के
मधुर स्वर की स्मृति
आगे नहीं बढ़ पाई मैं
काली नदी स्वच्छ हो जाने
उसके किनारे फलों- फूलों के
वृक्षों पर पंख फैलाये
मोरों के बैठे रहने
के सुन्दर सपने से
आगे नहीं बढ़ पाई मैं
न जाने क्यूँ
आगे नहीं बढ़ पाई मैं
न जाने क्यूँ
आगे नहीं बढ़ पाई मैं
मणि



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